न आदेश का असर, न कोर्ट की परवाह—पटना की सड़कों पर खुलेआम चल रहीं जुगाड़ गाड़ियां

जब कानून सिर्फ फाइलों तक सीमित रह जाए और ज़मीन पर उसका असर न दिखे, तब आम लोगों की जान सबसे ज़्यादा जोखिम में पड़ जाती है. पटना की सड़कों पर बेधड़क चलती जुगाड़ गाड़ियां इसी कमजोर व्यवस्था और दोहरे रवैये की सबसे बड़ी और ज़िंदा तस्वीर बन चुकी हैं.

न आदेश का असर, न कोर्ट की परवाह—पटना की सड़कों पर खुलेआम चल रहीं जुगाड़ गाड़ियां
परिवहन मंत्री श्रवण कुमार के कड़े निर्देश और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर पटना हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद बिहार की राजधानी पटना समेत कई जिलों में जुगाड़ गाड़ियां अब भी अवैध रूप से चल रही हैं। आशियाना–दीघा मार्ग, कंकड़बाग, राजेंद्र नगर, बेली रोड, अशोक राजपथ और पटना सिटी जैसे इलाकों में ये वाहन बिना किसी डर के सड़कों पर नजर आ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन्हें रोकने के लिए न तो पटना डीटीओ और न ही अन्य जिलों के डीटीओ की ओर से अब तक कोई प्रभावी या विशेष अभियान चलाया गया है। आदेश सख्त, कार्रवाई नदारद परिवहन मंत्री ने सभी जिलों के डीटीओ को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि जुगाड़ गाड़ियों के अवैध संचालन पर पूरी तरह अंकुश लगाया जाए और इसके लिए विशेष अभियान शुरू किया जाए। यह निर्देश पटना हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद जारी किया गया था, जिसमें जुगाड़ गाड़ियों को सड़क सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया गया था। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर आदेशों का पालन होता नजर नहीं आ रहा हैइसके बाद भी हकीकत यही है कि विभाग के पास आज तक यह स्पष्ट जानकारी नहीं है कि किस जिले में कितनी कार्रवाई की गई. ऐसे में यह सवाल लाज़मी है कि क्या जारी किए गए आदेश सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित होकर रह गए हैं. पहचान और सुरक्षा से दूर, फिर भी सड़कों पर बेखौफ जुगाड़ गाड़ियां ऐसे अस्थायी और गैर-मानक वाहन होते हैं, जिन्हें किसी तय तकनीकी मापदंड के तहत तैयार नहीं किया जाता. परिवहन विभाग के अधिकारियों के अनुसार केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली 1989 के नियम 126 के अंतर्गत अधिकृत परीक्षण एजेंसियां इनके लिए प्रोटोटाइप प्रमाणपत्र जारी ही नहीं करतीं. इसका नतीजा यह होता है कि इन वाहनों का न तो पंजीकरण हो सकता है, न बीमा, न परमिट, न फिटनेस और न ही प्रदूषण प्रमाणपत्र. इसके बावजूद ये जुगाड़ गाड़ियां हर दिन शहर की सड़कों पर सैकड़ों यात्रियों और सामान को ढोती नजर आती हैं. दुर्घटना की स्थिति में न सुरक्षा, न राहत सबसे गंभीर चिंता का विषय यह है कि अगर जुगाड़ गाड़ी से कोई हादसा हो जाए, तो न वाहन मालिक को और न ही पीड़ित को किसी तरह का मुआवजा मिल सकता है. बीमा के अभाव में पूरा आर्थिक और शारीरिक नुकसान आम लोगों को खुद ही झेलना पड़ता है. इस तरह सड़क पर चल रहा हर व्यक्ति अनजाने खतरे के साए में है. जाम और अव्यवस्था का कारण बनती जुगाड़ गाड़ियां इन वाहनों की बनावट और रफ्तार सड़क मानकों के अनुरूप नहीं होती. इसी कारण ये ट्रैफिक जाम, सड़क हादसों और अव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं. नियमों की खुलेआम अनदेखी से न सिर्फ परिवहन विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठते हैं, बल्कि यह संदेश भी जाता है कि सड़कों पर कानून का असर कमजोर पड़ चुका है. परिवहन विभाग की नींद कब टूटेगी? पटना की सड़कों पर जुगाड़ गाड़ियों का लगातार संचालन इस बात का सबूत है कि आदेश जारी होने और ज़मीनी कार्रवाई के बीच गहरी दूरी है. जब तक डीटीओ स्तर पर नियमित जांच, सघन अभियान और सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक न सड़कें सुरक्षित बन पाएंगी और न ही कानून का डर बहाल हो सकेगा.