Bihar News: मछली उत्पादन में बिहार की ऐतिहासिक उपलब्धि, 10 साल में 2 गुना बढ़ोतरी, देश में चौथा स्थान
Bihar News: मछली उत्पादन में बिहार की ऐतिहासिक उपलब्धि, 10 साल में 2 गुना बढ़ोतरी, देश में चौथा स्थान
कभी मछली उत्पादन में देश में नौवें स्थान पर रहने वाला बिहार अब चौथे पायदान तक पहुंच गया है। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक, सरकारी नीतियों और मछुआरों की मेहनत का नतीजा है।
बिहार ने मछली उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाते हुए देशभर में चौथा स्थान हासिल कर लिया है. वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान राज्य में कुल 9.59 लाख टन मछली का उत्पादन दर्ज किया गया, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है.
डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग की लगातार कोशिशों, सरकारी योजनाओं और आधुनिक तकनीकों को अपनाने का यह सकारात्मक नतीजा है. बीते दस वर्षों में बिहार के मछली उत्पादन में लगभग 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिससे न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ी है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है.
नौवें स्थान से चौथे स्थान तक का सफर
वर्ष 2013-14 में बिहार मछली उत्पादन के मामले में देश में नौवें पायदान पर था. इसके बाद सरकार ने मत्स्यपालन को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और आधारभूत संरचना पर विशेष ध्यान दिया. इन प्रयासों का असर यह रहा कि वर्ष 2023-24 में बिहार चौथे स्थान पर पहुंच गया. वहीं 2024-25 में 9.59 लाख टन के रिकॉर्ड उत्पादन के साथ राज्य ने अपनी इस उपलब्धि को और मजबूत किया है. यह प्रगति दर्शाती है कि बिहार ने पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ते हुए वैज्ञानिक और आधुनिक मत्स्यपालन को सफलतापूर्वक अपनाया हैबिहार के वैज्ञानिक तालाबों ने बदली मछली उत्पादन की तस्वीर
बिहार में 7,575.12 हेक्टेयर क्षेत्र में आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों से तालाबों का निर्माण कर तकनीक आधारित मत्स्य पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे न केवल उत्पादन बढ़ा है, बल्कि मछलियों की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। राज्य की भौगोलिक विविधताओं के अनुसार स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपनाई गई तकनीकों ने मत्स्यपालकों को नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं।
कम जगह में अधिक उत्पादन – बायोफ्लॉक तकनीक
बायोफ्लॉक तकनीक ने बिहार में मछली पालन की दिशा ही बदल दी है। इस तकनीक के माध्यम से कम जगह और सीमित लागत में अधिक मछलियों का उत्पादन संभव हो रहा है। अब तक राज्य में 764 बायोफ्लॉक संरचनाएं स्थापित की जा चुकी हैं। शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी लोग इसे स्वरोजगार के रूप में अपना रहे हैं।
पानी की बचत और अधिक उत्पादन – आरएएस तकनीक
री-सर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस) तकनीक के इस्तेमाल से 90 प्रतिशत तक पानी की बचत हो रही है। साथ ही उच्च सघन मत्स्य पालन संभव हो रहा है, जिससे कम संसाधनों में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है। यह तकनीक खासतौर पर उन क्षेत्रों में फायदेमंद साबित हो रही है, जहां पानी की उपलब्धता सीमित है।
रोजगार और आय का नया स्रोत
मछली उत्पादन में यह बढ़ोतरी हजारों किसानों और युवाओं के लिए रोजगार और आय का नया साधन बन गई है। अब मत्स्य पालन केवल पारंपरिक पेशा नहीं रहा, बल्कि यह एक संगठित, तकनीक आधारित उद्योग के रूप में उभर चुका है।
राष्ट्रीय स्तर पर बिहार की पहचान
देश में चौथे स्थान पर पहुंचना बिहार की उपलब्धियों और पहचान का प्रतीक है। यह दिखाता है कि सही नीतियों, आधुनिक तकनीक और इच्छाशक्ति के माध्यम से राज्य कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।